हेमंत सोरेन : संस्कृति-संस्कार व जड़ से जुड़ाव।

 

निर्भय कुमार पाण्डेय।

हेमंत सोरेन वर्तमान में झारखण्ड के मुख्यमंत्री हैं, जो लगातार दूसरी बार अपनी कुर्सी बचा पाने में कामयाब रहे हैं। वह अब तक सबसे अधिक, चार बार झारखण्ड के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने वाले पहले राजनेता भी हैं। दरअसल, वर्ष 2000 के 15 नवंबर को बिहार से पृथक होकर ‘झारखण्ड’ एक नया राज्य बना। चूंकि यह आदिवासी बहुल राज्य है। पर पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के अलावा हेमंत सोरेन आदिवासी होते हुए भी पहले ऐसे राजनेता हैं, जिन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल मुख्यमंत्री के तौर पर पूरा किया और कांग्रेस के समर्थन से वर्ष 2024 में लगातार दूसरी बार सत्ता बचा पाने में कामयाब रहे हैं।

इस दरमीयान, बाबू लाल मरांडी, झारखण्ड राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने, तीन-तीन बार अर्जुन मुंडा और शिबू सोरेन, एक बार मधु कोड़ा और एक बार रघुवर दास ने भी मुख्यमंत्री का पदभार संभाला। वहीं, कुछ महीनों के लिए मुख्यमंत्री के तौर पर चाम्पई सोरेन ने भी झारखण्ड की सत्ता संभाली, जब हेमंत सोरेन को जेल जाना पड़ा था। उल्लेखनीय है कि अब तक केवल हेमंत सोरेन ही हैं, जो चार बार मुख्यमंत्री बन चुके हैं। हालांकि, झारखण्ड में अब तक तीन बार राष्ट्रपति शासन भी लगा चुका है।

वहीं, कुछ महीने पहले हेमंत सोरेन सरकार पर कथित तौर पर कई गंभीर और संगीन आरोप भी लगे, तब देश भर में रांची विरोध-प्रदर्शन के लिए जाना जाने लगा था। इस बीच एक दौर ऐसा भी हेमंत सरकार के लिए आया, जब लगा कि आगे खाई और पीछे कुआं जैसे हालात हैं। पर उन्होंने स्थिति का संभाला और कई नियुक्ति परीक्षाओं को रद्द कर दिया, जिसे बाद में झारखण्ड हाई कोर्ट ने उन पर स्टे लगाकर फौरी तौर पर हेमंत सरकार को राहत देने का कार्य किया और विरोध-प्रदर्शन करने वाले व नौकरी पाने व गंवाने वाले दोनों वर्ग कुछ समय के लिए शांत पड़ गए।

भले ही उन्हें अदालत से फौरी तौर पर राहत मिली और सरकार पर कोई खतरा नहीं मंडराया। पर हाल महीनों में उनके जीवन में दो बड़ी घटनाएं घटीं, जो सीधे तौर पर उनसे और उनके परिवार से जुड़ी हैं। अभी कुछ महीने पहले उनके पिता शिबू सोरेन की मृत्यु हुई और इसी महीने में उनकी मां रूपी सोरेन का भी निधन हो गया। मानों उन पर दुखों का पहाड़ एक साथ टूट पड़ा हो। पर हेमंत ने अपने नारे के मुताबिक (हेमंत है तो हिम्मत है) हिम्मत नहीं हारी।

इन दोनों ही घटनाओं के बाद मुख्यमंत्री का पैतृक गांव रामगढ़ जिले का नेमरा, ना केवल भारत में, बल्कि दुनिया में जाना जाने लगा। दरअसल, अपने पिता की मृत्यु के बाद हेमंत ने अपनी संस्कृति-संस्कार, रीति-रिवाजों और पंरपराओं की निर्वाहन के लिए जड़ से जुड़े होने के कारण नेमरा को ही चूना। पहले पिता के श्राद्ध-कर्म के लिए पैतृक गांव को चुना, जहां वह पूरी शिद्दत के साथ रीति-रिवाजों का निर्वाहन भी करते हुए दिखे, जिससे जुड़ी कई तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुई और मीडिया ने भी इस पूरे श्राद्ध-कर्म को पूरा कवरेज दिया। उन्होंने मां के श्राद्ध-कर्म के लिए भी नेमरा को ही चूना।

दरअसल, शिबू सोरेन को जल-जमीन और जंगल से कहीं अधिक लगाव था और पूरी जीवन इसकी लड़ाई भी लड़ी थी। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा और शिबू सोरेन का झारखण्ड को एक अलग राज्य बनाने में बड़ा योगदान रहा था। आए दिन सोशल मीडिया या फिर कहें कि श्राद्ध-कर्म से जुड़े, जो वीडियो और फोटो वायरल हो रहे थे, जो दर्शा रहे थे कि हेमंत के जीवन पर उनके पिता की तरह ही जल-जंगल जमीन और जड़ से जुड़ाव हैं। वह इस बात का संदेश भी देते हैं कि व्यक्ति भले ही कितनी ऊंचाई को ना छू ले। पर उसे अपने जड़ से जुड़ा होना ही चाहिए।

आप पढ़ाई-लिखाई कर भले ही देश के किसी बड़े महानगर में बस गए हों या फिर दुनिया के किसी विकसित देश में नौकरी कर रहे हों। पर कुछ ऐसे अवसर हर इंसान के जीवन में जरूर आते हैं, जो व्यक्ति जड़ से जुड़ने का मौका देते हैं। भले ही वह खुशी के पल हों या फिर दुख के पल। यहां गौर करने वाली बात यह है कि हेमंत इस वक्त एक राज्य के मुखिया हैं, जिनके कंधों पर पूरे राज्य की जिम्मेदारी है। बावजूद, वह एक बेटा होने के नाते अपने माता-पिता के श्राद्ध-कर्म के लिए नेमरा में डेरा डाल लेते हैं तो यह उन लोगों के लिए भी एक संदेश है, जो अपने नौकरीपेशा में व्यस्त होने के कारण अपने गांव, घर और समाज से दूरी बना लेते हैं और अकसर कहते नजर आते हैं कि समय का अभाव है।

इस पूरे घटनाक्रम में कहीं अधिक उल्लेखनीय यह है कि रीति-रिवाजाें के निर्वाहन में ना केवल उनकी पत्नी कल्पना सोरेन की महत्वपूर्ण भूमिका दिखती है, बल्कि लगता है कि मानों कंधे-कंधा मिला कर उनका सहयोग कर रही हैं। इस बार परिवार में सोरेन दंपति का बेटा और परिवार के अन्य सदस्यों ने भी उन रीति-रिवाजों का निर्वाहन करते हुए दिखाए दिए, जो हेमंत कर रहे थे। इस बीच हेमंत अपने बेटे होने की भूमिका तो निभाते हैं। वहीं, राज्य की मुखिया का भी भूमिका निभाते रहते हैं। राज्य सरकार के अधिकारियों और मंत्रीमंडल के सदस्यों के साथ बैठक करते या फिर बातचीत करते हुए उनकी तस्वीरे सामने आती ही रहती हैं।

दरअसल, अकसर समाज में देखा जाता है कि वे संस्कृति-संस्कार और रीति-रिवाजों से केवल इस बात को लेकर दूरी बनना शुरू कर देते हैं कि यह अंधविश्वास है या फिर रुढ़ीवादी परंपरा है। पर जब एक राज्य का मुखिया, जिसने एक दो-बार नहीं, बल्कि 13 जुलाई 2013 को पहली बार, 29 दिसम्बर 2019 को दूसरी बार, 4 जुलाई 2024 को तीसरी बार और चौथी बार 28 नवम्बर 2024 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली हो और लगातार दो बार मुख्यमंत्री बन कर उस वक्त इतिहास रचा हो, जब पूरे भारत वर्ष में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू चल रहा हो। वहीं, झारखण्ड जैसे राज्य में लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल किया हो, जो आज तक के इतिहास में किसी मुख्यमंत्री ने हासिल नहीं किया हो।

मुख्यमंत्री के तौर पर हेमंत सोरेन का कार्यकाल भले ही कुछ विवादों से जुड़ा रहा हो। उन्हें जेल भी जाना पड़ा हो और अपनी कुर्सी पार्टी के सबसे विश्वसनीय माने जाने वाले चम्पाई सोरेन को देनी पड़ी हो, जो बाद में वागी हो गए। पर व्यक्तिगत तौर पर एक बेटा होने के नाते हेमंत ने वह कर दिखया, जो भारत देश में गिने-चुने बेटा या परिवार के सदस्य कर पाते हैं, जबकि सभी के पास ऐसा करने का अवसर होता है। दरअसल, हेमंत ऊंचे पद पर पहुंचने के बाद जड़ से जुड़े होने का दिखावा नहीं करते, बल्कि उसे जी कर दिखाते हैं। उनके पिता के श्राद्ध-कर्म से जुड़ा रीति-रिवाज का फोटा या फिर वीडियो सामने आते रहे थे और इस बार भी मां की मृत्यु के बाद भी आ रहे हैं। इसे कुछ लोग दिखावा कह सकते हैं। पर जिस प्रकार से हेमंत ने अपनी संस्कृति-संस्कार व परंपरा को निभाया है। उससे तो यही कहा जा सकता है कि भले ही हेमंत का आने वाले वर्षों में राजनीतिक भविष्य कुछ भी हो। पर उन्होंने एक बेटा होने का जो फर्ज निभाया या फिर जिया है। उसे बहुत कम लोग जी या निभा पाते हैं।

बाजारवाद या फिर भूमंडलीकरण के इस युग में हर कोई समयाभाव का बहना बना कर अपनी रीति-रिवाजों या फिर संस्कृति से दूर होने का जरिया खोज लेता है। ऐसे में एक राज्य का मुखिया और एक बेटा का कर्तव्य निभा कर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कई दिलों को जीता है। भले ही आने वाले समय में उनका राजनीति जीवन में उतार-चढ़ाव आएं। पर बेटा होने के साथ राजनेता का जो दायित्व उन्होंने निभाया है। वह खासकर युवा वर्ग और उन लोगों के लिए सीख है, जो संस्कृति-संस्कार व अपने जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। हेमंत का नारा होना चाहिए, जड़ से जुड़ाव–जल-जंगल-जमीन से लगाव।

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